सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। अदालत ने इन नियमों की कई धाराओं पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि ये समाज में विभाजन को बढ़ावा दे सकती हैं और जातिविहीन समाज के लक्ष्य पर “खतरनाक” असर डाल सकती हैं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि 2026 के नियम “अगले आदेश तक” स्थगित रहेंगे। इस दौरान उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के निवारण के लिए 2012 के नियम लागू बने रहेंगे।
पीठ ने 2026 नियमों की भाषा और संरचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा “पूरी तरह अस्पष्ट” है और उनके प्रावधानों का दुरुपयोग संभव है। अदालत ने कहा, “हमें यह कहते हुए खेद है कि नियमों की भाषा प्रथम दृष्टया पूरी तरह अस्पष्ट है, प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है और भाषा को फिर से मॉड्युलेट कर पुनः डिजाइन करने की जरूरत है।” पीठ ने इस संबंध में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने के निर्देश भी दिए। CJI ने टिप्पणी की कि देश 75 वर्षों में जातिविहीन समाज की दिशा में जो प्रगति कर पाया है, क्या ये नियम उसे पीछे धकेलने वाले हैं। उन्होंने कहा, “देश में 75 साल बाद जातिविहीन समाज के लक्ष्य की दिशा में जो कुछ भी हासिल हुआ है, क्या हम कोई प्रतिगामी नीति बना रहे हैं?”
न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों में “स्वतंत्र, समावेशी और समान” वातावरण बनाने के लिए नियमों की आवश्यकता से वे सहमत हैं, लेकिन 2026 नियमों में “4-5 गंभीर चिंताएं” हैं, जिन्हें दूर किए बिना इनके व्यापक और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। पीठ ने एक प्रावधान को विशेष रूप से समस्या-जनक बताया, जिसके तहत छात्रों की जाति के आधार पर अलग-अलग छात्रावास (hostels) की व्यवस्था का प्रस्ताव होने की बात कही गई। अदालत ने संकेत दिया कि इस तरह की व्यवस्था समानता और समावेशन के बजाय संस्थागत अलगाव (segregation) को बढ़ावा दे सकती है।
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